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यूं तो आकाश मंडल में अनेक छोटे-बड़े ग्रह, उपग्रह तथा तारापुंज इत्यादि विद्यमान हैं, लेकिन मुख्य रूप से नौ ग्रह माने गए हैं जो क्रमश: सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु एवं केतू के नाम से जाने जाते हैं। इन सभी ग्रहों का सृष्टि में रहने वाले समस्त प्राणीमात्र पर पूरा प्रभाव रहता है। ग्रहों की पूजनादि से न केवल इस लोक में कामनाओं की प्राप्ति होती है, बल्कि इनके पूजनादि से देवलोक अर्थात स्वर्ग की भी प्राप्ति होती है। मानसिक असंतोष तथा आकस्मिक विपत्तियों में ग्रह यज्ञ सुख प्रदान करने में सहायक होता है। नवग्रहों के यज्ञ से सुख-शांति तथा पुष्टि दोनों की ही प्राप्ति होती है। वृष्टि के लिए तथा धनलक्ष्मी एवं दीर्घायु की प्राप्ति के लिए भी ग्रह यज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। ऐसा मत्स्य महापुराण में वर्णित है। सर्वप्रथम तो यह जान लेना आवश्यक है कि नवग्रहों के अधिदेवता यानि अधिरक्षक देवता कौन-कौन हैं। इनमें क्रमश: सूर्य के अधिदेवता शिव, चन्द्रमा के पार्वती, मंगल के स्कंध, बुध के विष्णु, वृहस्पति के ब्रह्मा, शुक्र के इंद्र, शनि के यम, राहु के काल एवं केतु ग्रह के अधिदेवता चित्रगुप्त माने गए हैं। अधिदेवता के अलावा प्रत्यधिदेवता भी है जो क्रमश: सूर्य के अग्नि, चन्द्र के जल, मंगल के पृथ्वी, बुध के विष्णु, वृहस्पति के इंद्र, शुक्र के इंद्राणी, शनि के प्रजापति, राहु के सर्प एवं केतु के ब्रह्मा हैं। (श्री मत्स्यपुराण अध्याय 93वां श्लोक 13-16) नवग्रह मंडल में नवग्रहों के अधिदेवताओं तथा प्रत्यधिदेवताओं के साथ-साथ पांच लोकपाल (गणेश, दुर्गा, वायु, आकाश एवं अश्विनी कुमार) तथा दस दिकपाल देवताओं क्रमश: पूर्व, आग्रेय, दक्षिण, नैऋव्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर, ईशान, उध्र्व एवं अद्य: का भी पूजन किया जाता है। आत्मा का प्रतिनिधित्व करने वाले सौरमंडल के प्रथम ग्रह सूर्य के बारे में यह बतला देना आवश्यक है कि सूर्य ग्रह नवग्रहों में आत्मा के कारक ग्रह के रूप में पूजे जाते हैं।

सूर्य एक प्रत्यक्ष ग्रह है। सूर्य से ही दिन का सृजन होता है। सूर्य संसार के नेत्र हैं। समस्त वेद भी सूर्य को परमात्मा के नाम से पुकारते हैं। सूर्य से ही दिन-रात, घटी पल, मास, पक्ष, अयन तथा संवत् आदि का विभाग होता है। क्या सूर्य का जन्म हुआ, अगर जन्म हुआ तो कैसे हुआ, कहां हुआ तथा किसके गर्भ से हुआ? इस संदर्भ में एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवासुर संग्राम में दानवों ने देवताओं को पराजित कर दिया। तब से देवता मुंह छिपाकर सदैव अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए प्रयत्नशील रहने लगे। देवताओं की माता अदिति हैं। अदिति प्रजापति दक्ष की कन्या है। अदिति महर्षि कश्यप की धर्मपत्नी है। अपने पुत्रों की पराजय से दुखी होकर अदिति ने सूर्य की उपासना की तथा उनसे विनती की, कि हे सूर्यदेव! राक्षसों ने मेरे पुत्रों का राज्य तथा यज्ञ भाग छीन लिया है, इसलिए आप मेरे पुत्रों की रक्षार्थ मेरे गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेकर मेरे पुत्रों की रक्षा करो। सूर्यदेव अदिति की उपासना से अत्यंत प्रसन्न होकर कहने लगे कि हे देवी अदिति! मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण करूंगा तथा अपने एक हजारवें अंश से तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हारे पुत्रों की रक्षा करूंगा। समय आने पर सूर्य का जन्म अदिति के गर्भ से हुआ। देवतागण भगवान सूर्य को अपने भाई के रूप में पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए। श्री अग्निमहापुराण में वर्णित है कि श्री विष्णु भगवान के नाभिकमल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी के पुत्र का नाम मरीचि है। मरीचि से महर्षि कश्यप का जन्म हुआ। महर्षि कश्यप सूर्य के पिता हैं। चूंकि सूर्य माता अदिति के गर्भ से पैदा हुए, इसलिए इनका नाम आदित्य पड़ा। ‘अदितेरपत्यं पुमान आदित्य:’

सूर्य की हजारों किरणों में से तीन सौ किरणें देवलोक पर, तीन सौ पृथ्वीलोक पर तथा चार सौ किरणें पितृलोक पर प्रकाश बिखेरती है। सूर्यदेव की दो पत्नियां हैं। एक का नाम संज्ञा (संज्ञा के अन्य नाम क्रमश: सुरेणु, त्वाष्ट्री, द्यौ, वडवा, प्रभा एवं राज्ञी) हैं तथा दूसरी का नाम छाया (निक्षुभा) है। संज्ञा विश्वकर्मा की बेटी है। संज्ञा की परछाई ही छाया के रूप में सूर्य की दूसरी पत्नी है। संतान के रूप में सूर्य को संज्ञा से यम, यमी (यमुना), वैवस्वत मनु, अश्विनीकुमार तथा रेवंत और छाया से शनिदेव, भद्रा, तपती तथा सावर्णि मनु प्राप्त हुए। दोनों अश्विनीकुमार देवताओं के वैद्य हैं।

सूर्य की उपासना में नौ पीठ शक्तियों की भी पूजा की जाती है, जो कि क्रमश: दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोद्या, विद्युता एवं सर्वतोमुखी के नाम से जानी जाती है। सूर्यदेव की अन्य 12 शक्तियां भी है जो कि क्रमश: इडा, सुषुन्मा, विश्वार्चि, इंदु, प्रमर्दिनी, प्रहर्पिणी, महाकाली, कपिला, प्रबोधिनी, नीलांबरा, अमृता तथा घनांत:स्था के नाम से जानी जाती है। सूर्य का रंग लाल तथा वाहन रथ है। इनका रथ वेदस्वरूप है। रथ में एक ही चक्र है जो संवत्सर कहलाता है। रथ में बारह आरे हैं, जो कि बारह मास कहलाते हैं। रथ में छह नेमियां हैं जो छह ऋतुएं कहलाती हैं। रथ में तीन नाभियां हैं जो तीन चौमासे के रूप में जानी जाती है। (श्रीमद् भागवत) आयुधों में चक्र, शक्ति, पाश तथा अंकुश मुख्य आयुध हैं। सूर्य का रथ सात घोड़ों एवं सात रस्सियों से युक्त हैं। कमल पर आसीन सूर्यदेव की दो भुजाएं हैं। हाथों में कमल विद्यमान रहते हैं। सूर्य के प्रकाश से तथा उपासना से कुष्ठ रोग एवं नेत्र रोग ठीक हो जाते हैं।

 

मनुष्य को सूर्य से निरोगता, अग्नि से धन, शिव से ज्ञान तथा जनार्दन भगवान विष्णु से मोक्ष की इच्छा करनी चाहिए।

ज्योतिष शास्त्र में भगवान सूर्यदेव को प्राण तथा आत्मा के रूप में माना जाता है। सूर्य स्थिर होकर भी गतिमान है। सूर्यदेव सम्पूर्ण ग्रहों को एक सूत्र में नियमबद्ध गति से अपने चारों ओर घुमाते हैं एवं समस्त ग्रहों को एक-एक बार अपने तेज से अस्तंगत कर देते हैं। सूर्य समस्त ग्रहों एवं नक्षत्रों के अधिष्ठाता तथा काल के नियंता हैं। सूर्य के ऊपरी कक्षा चक्र के अनुसार मंगल, वृहस्पति तथा शनि है तथा नीचे शुक्र, बुध तथा चन्द्र कक्षाएं हैं। सूर्य सिंह राशि के स्वामी है। मेष राशि में दस अंश स्थित उच्च तथा तुला राशि में नीच के कहलाते हैं। सूर्य चंद्र तथा गुरू के कारण पांच प्रकार के संवत्सरों का निर्माण होता है जो कि क्रमश: वत्सर, परिवत्सर, अनुवत्सर, इडावत्सर तथा संवत्सर के नाम से जाने जाते हैं। सूर्य क्षत्रिय वर्ण के, पुरुष प्रकृति के, क्रूर संज्ञा के, सत्व गुण के, लाल रंग के, देवस्थान पर रहने वाले, पित्त प्रकृति के, अपनी दृष्टि आकाश की ओर रखने वाले, मुंह पूर्व की ओर रखने वाले, कटुकरस के विधाता, वृद्ध अवस्था के तथा सुवर्ण धातु स्वरूप वाले  हैं। माणिक्य नग धारण करने तथा हरिवंश श्रवण से सूर्य संबंधी दोष मिट जाते हैं। सूर्य के मित्र ग्रह गुरू, मंगल तथा चंद्र, शत्रु ग्रह शुक्र तथा शनि है। बुध से सूर्य उदासीनता रखते हैं। सूर्य की महादशा छह साल की होती है। अगर जातक की कुंडली में सूर्य अशुभ हो तो जातक को क्षय, अतिसार, अग्निरोग, ज्वरवृद्धि तथा जलनादि रोगों से एवं राजा, अधिकारी, ब्राह्मण तथा सेवकों द्वारा हानि होती है। सूर्य अपनी उच्च राशि मेष, द्रेष्काण, रविवार, नवांश, उत्तरायण, होरा, राशि के आरंभ, मित्र के नवमांश तथा लग्न से दसवें भाव में सदैव बलवान अवस्था में होते हैं। सूर्य से पिता, आत्मा, यश, मान, प्रतिष्ठा तथा आरोग्यता आदि का विचार किया जाता है। सूर्यदेव के पुराणों में  बाहर नामों का वर्णन है जो कि क्रमश: धाता, अर्यमा, मित्र, वरूण, इंद्र, विवस्वान, पूषा, पर्जन्य, अंशुमान, भग, त्वष्टा तथा विष्णु हैं। पितरों की पूजा करने से सूर्यदेव अत्यंत प्रसन्न होते हैं क्योंकि गाय, पित्तर तथा ब्राह्मण सूर्य को अतिप्रिय हैं। सूर्य के अनिष्ट प्रभाव से बचने के लिए गेहूं, लाल व , गुड, ताम्र, रक्तचंदन, रक्तकमल, गाय तथा माणिक्य इत्यादि दान के रूप में रविवार के दिन सूर्योदय के समय देने चाहिए। दीर्घायु हेतु तथा हृदय रोग के निराकरण हेतु आदित्य हृदय  का पाठ विशेष रूप से फलदायी होता है। कालपुरुष की आत्मा सूर्य ही है। पूर्व दिशा का स्वामी सूर्य ग्रीष्म ऋतु में विशेष रूप से बलवान होता है। यूं तो सूर्य सत्वगुणी हैं, लेकिन पापफल देने के कारण यह रजोगुणी भी है। यद्यपि सूर्य उत्तरायण में बली होता है, लेकिन दक्षिणायन का सूर्य भी बली होता है। सूर्य मकर संक्रांति के दिन मकर राशि में प्रवेश करता है (यहीं से सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करता है।) मकर से लेकर मिथुन तक की छह राशियों में सूर्य उत्तरायण में ही होते हैं, शेष कर्क से धनु राशियों में सूर्य दक्षिणायन में होते हैं। किसी भी जातक की कुंडली में सूर्य पुरुष राशि का हो तो वह जातक सुंदर नहीं होता, अपितु वह जातक मनोबली, सहनशील तथा बलवान होता है। सूर्य अगर  स्त्री राशि में हो तो जातक सुंदर तथा सुडौल होता है। पुरुष राशि के सूर्य के जातक गेहुंआ रंग के तथा  स्त्री राशि के सूर्य के जातक गौरवर्ण के होते हैं। सूर्य किसी भी कुंडली में मेष, कर्क, तुला, धनु तथा मकर का हो तो वह जातक सम्पूर्ण जिंदगी घूमने का शौकीन होता है। ऐसे जातक घर में भी घूमते या टहलते ही रहते हैं अर्थात् एक जगह स्थिर होकर नहीं बैठते हैं।

भगवान विष्णु एवं भगवान शिव आदि देवताओं के दर्शन सब मनुष्यों को नहीं होते इनका तो ध्यान में ही इनके स्वरूप का साक्षात्कार किया जाता है, लेकिन भगवान सूर्य ही एक ऐसे देवता है जिनके दर्शन प्रत्येक प्राणीमात्र को  प्रत्यक्ष रूप में प्राप्त होते हैं इसलिए भगवान सूर्यनारायण को प्रत्यक्ष देवता के रूप में माना जाता है। जो मनुष्य सूर्यदेव की उपासना, आराधना करते हैं वे इस लोक में तथा परलोक में अंधे, दरिद्र्, दु:खी तथा शोकग्रस्त नहीं होते।

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