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दान आठ प्रकार के होते हैं जो क्रमशः इस प्रकार से हैं :

तिल ( काले सफेद ), नमक, सोना, कपास, भूमि, गाय, लोहा (पृथ्वी को हाथ लगाकर ) तथा सतनौजा। (धान, जौं, गेहूं, मूंग, उड़द, काकून, चना) दान दोनों हाथों से देना चाहिये।

संक्रान्ति, अमावस, सन्धिकाल, ग्रहणकाल व पर्वकाल में दान देने का विशेष महत्व होता है।

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  • पुत्र द्वारा माता पिता के हाथों से दिलवाया गया दान पुत्र के लिये सर्वपुन्यफलदायी होता है।
  • भाई द्वारा बहनों के निमित्त दिया गया दान भी बहुत बड़ा दान होता है।
  • इसके साथ-साथ माता पिता को अग्निदान, कंधादान केशदान करना अश्वमेघ यज्ञ के बराबर का दान कहलाता है।