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हिंदू संस्कृति में कुल 33 कोटि देवता हैं। उनमें से 12 आदित्य (सूर्यनारायण) हैं। 12 आदित्य 12 महीनों में तपते हैं। जो 12 आदित्य अलग अलग महीनों में अपनी प्रकाश किरणें पृथ्वी पर बिखेरते हैं। वह क्रमशः निम्नलिखित प्रकार से हैं

धाता सूर्य: चैत्र मास में तपने वाले सूर्य देव का नाम धाता है। धाता सूर्य 8000 किरणों के साथ तपते हैं। चैत्र मास में “भानवे नमः” मंत्र से सूर्य देव की पूजा करनी चाहिए। इस मास में रविवार के दिन धाता की पूजा करने, अर्घ्य देने तथा नैवेद्य में घृत, पूरी तथा अनार चढ़ाने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं। इस व्रत के दिन केवल दूध ही पीना चाहिए।

अर्यमा सूर्य: वैशाख मास में तपने वाले सूर्यदेव का नाम अर्यमा सूर्य है। यह सूर्य देव पितरों के अधिपति हैं। श्राद्ध पक्ष में पितरों की तुष्टि इन्हीं की तृप्ति से होती है। यज्ञ में मित्र और वरुण के साथ ये “स्वाहा” तथा श्राद्ध में “स्वधा” का दिया हव्य – कव्य दोनों स्वीकार करते हैं। रविवार के दिन तक “तपनाय नमः” कहकर सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिए। नैवेद्य में उड़द, घृत तथा अर्ध्य में अंगूर या मुनक्का देनी चाहिए।

मित्र सूर्य: ज्येष्ठ मास में सूर्य देव मित्र नाम से जाने जाते हैं। मित्र सूर्य, सूर्य के बारहवें अवतार हैं। ज्येष्ठ मास में रविवार के दिन “मित्राय नमः” का जप करना चाहिए। नैवेद्य में सत्तू, दही व दलिया चढ़ाना चाहिए। ब्राह्मण को दही, चावल व आम के साथ साथ दक्षिणा भी देनी चाहिए। मित्र सूर्य की उपासना से कुष्ठ रोग भी ठीक हो जाता है।

वरुण सूर्य: सूर्य देव के 11 वें लीलामूर्ति का नाम वरुण है। आषाढ़ मास में प्रत्येक रविवार को “रवये नमः” कहकर सूर्य की पूजा करनी चाहिए। नैवेद्य में चिउड़ा तथा अर्घ्य में जायफल देना चाहिए। ब्राह्मण को दहीभात का भोजन तथा दक्षिणा देनी चाहिए। आषाढ़ मास में पड़ने वाले सूर्य का नाम वरुण है। वरुण पांच सहस्त्र किरणों से तपते हैं। वरुण आदित्य का उपासक कभी भी दरिद्रता का कष्ट नहीं भोगता। इनकी उपासना से पुत्र की प्राप्ति भी होती है। यह सूर्य देव समुद्रों के स्वामी हैं।

इंद्र सूर्य: श्रावण मास के अधिपति सूर्य का नाम इंद्र सूर्य है। इंद्र सूर्य सहस्त्र रश्मियों से तपते हैं।श्रावण मास में “इंद्राय नमः” कहकर भगवान सूर्य को अर्ध्य देने वाले पर स्वयं भगवान सूर्य प्रसन्न होकर उन्हें ऐश्वर्य तथा विद्या की प्राप्ति देते हैं। “गभस्तयो नमः” कहकर श्रावण के सूर्य की करवीर पुष्प से पूजा करनी चाहिए। नैवेद्य में सत्तू, पूरी तथा खीरा चढ़ाना चाहिए। ब्राह्मण को रविवार के दिन भोजन तथा दक्षिणा देनी चाहिए।

विवस्वान सूर्य: भाद्रपद में तपने वाले सूर्यदेव का नाम विवस्वान है। विवस्वान सूर्य दस सहस्त्र रश्मियों से तपते हैं। भगवान सूर्य का आठवां स्वरूप साक्षात अग्निदेव का ही है। अग्नि को ही विवस्वान कहते हैं। भाद्रपद मास में प्रत्येक रविवार को व्रत रखकर भगवान विवस्वान को अर्घ्य देना चाहिए तथा “यमाय नमः” कहकर चावल, घृत तथा कुम्हड़ा चढ़ाना चाहिए। इनकी कृपा से बुद्धि और यश की प्राप्ति होती है।

पूषा सूर्य: आश्विन मास में पूषा सूर्य की आराधना की जाती है। पूषा सूर्य छह सहस्त्र रश्मियों से तपते हैं। भगवान सूर्य के पांचवें विग्रह का नाम पूषा है। ये अन्न में रहकर प्रजाजनों की पुष्टि करते हैं। अश्विन मास के प्रत्येक रविवार को “हिरण्यरेतसे नम:” कहकर पूषा सूर्य की पूजा करनी चाहिए। नैवेद्य में चीनी तथा अनार चढ़ाना चाहिए। ब्राह्मण को भोजन, चावल तथा चीनी देनी चाहिए।

पर्जन्य सूर्य: कार्तिक मास में तपने वाले सूर्य का नाम पर्जन्य सूर्य है। पर्जन्य सूर्य 9000 रश्मियों से तपते हैं। सूर्य देव का तीसरा लीला विग्रह पर्जन्य के नाम से विख्यात है। यह बादलों में स्थित होकर अपनी किरणों द्वारा वर्षा करते हैं। कार्तिक मास के प्रत्येक रविवार को अगस्त्य पुष्प तथा अपराजित धूप के द्वारा इनकी पूजा करनी चाहिए। नैवेद्य के स्थान पर गुड़ के बनाए हुए पुए तथा ईख का रस अर्थात गन्ने का रस चढ़ाना चाहिए। उसी नैवेद्य के द्वारा ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा आदि देनी चाहिए। कार्तिक मास में जो सूर्य देव के मंदिर में दीप दान करता है उसे संपूर्ण यज्ञों का फल प्राप्त होता है तथा वह सूर्य की भांति तेजस्वी हो जाता है। जो पुरुष कार्तिक मास में सूर्य मंदिर में दीप दान करता है वह आरोग्य, धन, बुद्धि व उत्तम संतान और पूर्वजन्म की स्मृति पाता है। इसलिए कार्तिक मास में भक्तिपूर्वक भगवान सूर्य का स्मरण करते हुए दीप दान करना चाहिए।

अंशुमान सूर्य: मार्गशीर्ष मास में अंशुमान सूर्य की आराधना करनी चाहिए। अंशुमान सूर्य नौ सहस्त्र किरणों से तपते हैं। भगवान सूर्य के दसवें स्वरूप को अंशुमान कहते हैं। यह मार्गशीर्ष मास के अधिपति हैं। इनका तत्व वायु में ही समाहित रहता है। मार्गशीष मास में प्रत्येक रविवार को व्रत रखना चाहिए तथा भगवान सूर्य को नैवेद्य में चावल, घृत तथा गुड़ के साथ नारियल चढ़ाना चाहिए।

भग सूर्य: पौष मास में भग नामक सूर्य की आराधना करने का विधान है। 11000 रश्मियों से तपने वाले भगवान भग का वर्ण रक्तवर्ण है। भगवान सूर्य के सातवें विग्रह का नाम भग है। यह ऐश्वर्य रूप से समस्त सृष्टि में निवास करते हैं। पौष मास के प्रत्येक रविवार को “विष्णवे नमः” कहकर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। नैवेद्य में भगवान सूर्य को तिल, चावल की खिचड़ी तथा अर्घ्य में बिजोरा निंबू देना चाहिए।

त्वष्टा सूर्य: माघ मास में त्वष्टा सूर्य की आराधना का विधान है। त्वष्टा सूर्य 8000 रश्मियों से तपते हैं।  भगवान सूर्य के चौथे विग्रह का नाम त्वष्टा है। यह संपूर्ण वनस्पतियों तथा औषधियों में स्थित रहते हैं। त्वष्टा सूर्य हस्तशिल्प के अधिदेवता हैं। अपने शिल्प कर्म की उन्नति के लिए हिंदू शिल्पी भाद्रपद की सक्रांति को इन्ही की आराधना करते हैं।

विष्णु सूर्य: फाल्गुन मास में विष्णु सूर्य की आराधना का विधान है। विष्णु सूर्य छह सहस्त्र रश्मियों से तपते हैं। फाल्गुन के सूर्य का नाम विष्णु है। फाल्गुन मास में पहुंचते-पहुंचते सूर्य शक्ति संपन्न हो जाते हैं। वह ठंड से सिकुड़ी हुई सृष्टि में शक्ति का संचार करते हैं। उनकी उत्पादक शक्ति प्रखर हो जाती है। फाल्गुन मास में पयोव्रत द्वारा विष्णु रुपी आदित्य की उपासना करने से सूर्य के समान यशस्वी पुत्र की प्राप्ति होती है।

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