hans hi saraswati ka wahan kyu hain why goddess saswati alaways on swan (2)

हम सभी जानते है की माँ सरस्वती को विद्या और बुद्धि की देवी माना जाता है. जिस प्रकार भगवान शिव का वाहन नंदी, भगवान विष्णु का गरुड़, कार्तिकेय का मोर, माता दुर्गा का सिंह और श्री गणेशजी का वाहन मूषक है, उसी प्रकार माँ सरस्वती का वाहन हंस है. माँ सरस्वतीजी का वाहन हंस क्यों है? इस बात का उल्लेख हमे देवी की द्वादश नामावली में जानने को मिलता है-

हम सभी के मन में सहज ही यह जिज्ञासा होती है कि क्यों माँ सरस्वती का वाहन हंस है? इससे पहले हमे यह बात समझना होगी कि वाहन का अर्थ क्या होता है. यहां पर वाहन का अर्थ यह नहीं है कि देवी सरस्वती उस पर विराजमान होती है और आवागमन करती हैं. बल्कि यह वाहन एक प्रतीक है जो हमे यह संदेश देता है, जिसे हम आत्मसात करके अपने जीवन को श्रेष्ठता की ओर ले जा सकते हैं. देवी सरस्वती के वाहन हंस को विवेक का प्रतीक माना गया है. संस्कृत साहित्य में नीर-क्षीर विवेक का उल्लेख मिलता है. जिसका अर्थ होता है की- दूध का दूध और पानी का पानी करना. और यह क्षमता सिर्फ हंस में ही विद्यमान होती है–

नीरक्षीरविवेके हंसालस्यं त्वमेव तनुषे चेत्
– भामिनीविलास 1/13

इसका अर्थ यह है कि हंस में ऐसा विवेक और ऐसी शक्ति होती है कि वह दूध और पानी पहचान लेता है, और दूध और पानी में से दूध को ही पीता है.

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पवित्रता और शांति का प्रतीक

हम सभी जानते है की हंस का रंग शुभ्र या श्वेत होता है. सफ़ेद रंग पवित्रता और शांति का प्रतीक होता है. शिक्षा की प्राप्ति के लिए पवित्रता परम आवश्यक होती है. पवित्रता से ही श्रद्धा और एकाग्रता में वृद्धि होती है. शिक्षा से ही हमे ज्ञान की प्राप्ति होती है. ज्ञान से ही हम सही और गलत तथा शुद्ध और अशुद्ध की पहचान कर सकते है. और सही और गलत की पहचान करना ही विवेक कहलाता है. मनुष्य जीवन के विकास में शिक्षा बहुत ही अहम हिस्सा है, इसलिए सनातन धर्म में जीवन का पहला चरण शिक्षा प्राप्ति के साथ ही आरम्भ होता है, जिसे ब्रह्मचर्य आश्रम कहा जाता है. जिसमे पवित्रता और श्रद्धा से ज्ञान की प्राप्ति की जाती है और उसी पर माँ सरस्वती की कृपा होती है.

माँ सरस्वती की पूजा और उपासना का फल हमारे अंत:करण में विवेक के रूप में प्राप्त होता है. यदि हम हंस के गुण को हमारे जीवन में अपना लें तो हम कभी भी असफल नहीं होंगे. कह जाता है कि सच्ची विद्या वही है जिससे हमे आत्मिक शांति प्राप्त हो. देवी सरस्वती का वाहन हंस से हमे यही संदेश प्राप्त होता है कि हम पवित्र और श्रद्धावान बन कर ज्ञान की प्राप्ति करें और अपने जीवन को सफल बनाएं.

हंस एकनिष्ठ प्रेम का प्रतीक है

जैसा की शास्त्रों में वर्णित है की हंस और हंसनी का प्रेम अटूट होता था. शास्त्रों में वर्णित हंस-हंसनी के प्रेम की कथाओं को आज विज्ञान ने भी स्वीकार किया है. हंस-हंसनी अपना जोड़ा जीवन में एक ही बार बनाते हैं. यदि उन दोनों में से किसी एक की भी मौत हो जाती है तो दूसरा उसके प्रेम में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देता है, पर किसी दूसरे को अपना जीवन साथी नहीं बनाता. हिन्दू धर्म की हमारी परंपरा में हंस के इस प्रेम को मनुष्य के लिए आदर्श के रूप में माना गया है.

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