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नकली लबादा ओढ़े हुए लोग इस देश को किस गर्क  में लेकर जाएंगे यह तो बस ईश्वर ही जानता है, क्योंकि इस देश के हालात कुछ ऐसे बन चुके हैं जिसमें प्रतिभावान धक्के खाते फिर रहे हैं और गैर – प्रतिभावान पुरस्कारों से नवाज़े जा रहे हैं।  आजकल इस देश में धनबल के जोर पर ऐसे ऐसे कार्य हो रहे हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कौवे की कांय-कांय धनबल के जोर पर कोयल की कुहू कुहू में परिवर्तित हो रही है। अभी दो-तीन दिन पहले इंदौर के एक समाचारपत्र के मालिक को इंडियन मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से वर्ष 2018 के बेस्ट मीडिया सिंगर के अवार्ड से नवाज़ा गया। यह समारोह दिल्ली में आयोजित हुआ था। इस समारोह में दिल्ली के कुछ प्रशासनिक अधिकारियों के साथ साथ विशेष अतिथि के रुप में केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री श्रीमती कृष्णा राज भी शामिल थी।

इस समारोह का आयोजन सिंगर आर्गेनाइजेशन के सदस्य प्रेम भाटिया ने किया था। यहां इस बात का खुलासा कर देना भी आवश्यक है कि पुरस्कार से उन्हीं को नवाज़ा जाता है जो पुरस्कार के पात्र हों। चलते-फिरतों को पुरस्कारों से नवाजा जाए तो पुरस्कार भी अपने आप में अपमानित महसूस करता है। बेसुरा गायन व लय रहित गायन से न केवल संगीत के रसिकों को अपितु आम नागरिक को भी मानसिक आघात झेलना पड़ता है। यहां तक कि बेसुरी गायकी से जातक भी दुनिया में हंसी का पात्र बनता है। चूंकि लेखक ने उस अख़बार के मालिक की गायकी बहुत पास से सुनी है।

इसलिए जब उसको इस बात का पता चला कि उनको बेस्ट मीडिया सिंगर के अवार्ड से नवाज़ा गया है तो उसको इस बात की समझ ही नहीं लगी कि क्या वास्तव में ही देश की आंतरिक व्यवस्था का स्तर इस हद तक गिर गया है कि अपना लिखा न पढ़ पाने वाले तो इम्तिहान में टॉप करते हैं, डॉक्टरी की एबीसीडी न जानने वाले डॉक्टर बने जा रहे हैं, और जिनका गायन व गीत-संगीत से दूर दूर तक का रिश्ता नहीं है, उनको गायन के क्षेत्र में पुरस्कृत किया जा रहा है। वाह रे मेरे देश, तेरी तो विडंबना ही बड़ी अजीब है। लेखक इस बात को स्वीकार करता है और मानता भी है कि धनबल से कुछ भी खरीदा जा सकता है, लेकिन ध्यान रखना गला, कंठ, स्वर व मां सरस्वती की कृपा धनबल से कभी प्राप्त नहीं होती।

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