इंदौर। हर अपराध के लिए बच्चे को दंडित करना जरूरी नहीं। कई बार उसका गलती स्वीकारना भी पर्याप्त होता है। यह चिंता की बात है कि देश में बच्चों के प्रति यौन अपराधों में बढ़ोतरी हो रही है। जितने अपराध बच्चे करते हैं, उससे तीन गुना ज्यादा उनके साथ होते हैं। बच्चों के प्रति होने वाले अपराध को लेकर समाज के नजरिए में बदलाव की जरूरत है।

यह बात सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन बी लोकुर ने कही। वे शनिवार को किशोर न्याय अधिनियम के बेहतर क्रियान्वयन को लेकर आयोजित क्षेत्रीय कॉन्फ्रेंस में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक वर्मा, मप्र के चीफ जस्टिस हेमंत गुप्ता सहित पांच राज्यों के न्यायमूर्ति शामिल हुए। जस्टिस लोकुर ने कॉन्फ्रेंस में कहा कि बच्चों के प्रति होने वाले अपराध रोकने के लिए लोगों को तैयार करना जरूरी है लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि जिन्हें हम ट्रेनिंग दे रहे हैं, उनकी क्षमताएं क्या हैं।

उन्होंने राज्य सरकारों से अपील की कि वे अपने-अपने राज्य के बाल अपराधियों के पुनर्वास के लिए आगे आएं और अपनी हिस्सेदारी निभाएं। उन्होंने कहा कि देश में हर साल बच्चों द्वारा करीब 30 हजार अपराध किए जाते हैं। चिंता की बात है कि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या 90 हजार से ज्यादा है। बच्चों द्वारा किए गए अपराध के मामले में सजा सुनाते वक्त हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हमारे दबाव में कोई बच्चा उस अपराध की स्वीकारोक्ति न कर ले जो उसने किया ही नहीं। उनकी सजा के विकल्प पर भी विचार करना चाहिए। सोशल ऑडिट की भी जरूरत है।

जस्टिस दीपक वर्मा ने कहा कि हम एक तरफ तो चाइल्ड फ्रेंडली कोर्ट की बात कर रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ हमारे बाल न्यायालयों में जज डायस पर बैठकर सुनवाई कर रहे हैं। ऐसे में चाइल्ड फ्रेंडली कोर्ट की अवधारणा ही गलत हो जाती है। हमें हैदराबाद के ‘भरोसा’ को एक उदाहरण के रूप में देखना चाहिए। शहर में बच्चे या महिला के खिलाफ किसी भी थाने में अपराध दर्ज हुआ हो, पीड़ित को इस सेंटर पर भेज दिया जाता है।

यहां एक ही छत के नीचे डॉक्टर, मनोचिकित्सक, वीडियोग्राफी सहित तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं। पीड़ित को बयान देने के लिए भी कहीं नहीं जाना होता। सेंटर में ही कोर्ट रूम की व्यवस्था भी है। देशभर में ऐसी व्यवस्था लागू करने की जरूरत है। न्यायालय बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध में मुआवजा तो दिलवा देता है लेकिन उसका क्या इस्तेमाल हो रहा है, यह कोई नहीं देखता। ऐसी व्यवस्था होना चाहिए कि बच्चे के पुनर्वास के लिए दिलवाई जा रही रकम पर निगरानी रखी जा सके, ताकि उसका सही इस्तेमाल हो।

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कॉफ्रेंस में मप्र सहित गोआ, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात के न्यायमूर्ति और आईएएस अधिकारी शामिल हुए। राज्यों ने अपने-अपने प्रेजेंटेशन दिए। इसमें उन्होंने बताया कि बाल अपराध और बालकों के प्रति होने वाले अपराधों को रोकने के लिए उन्होंने 2 साल में क्या कदम उठाए और अगले दो साल के लिए उनके पास क्या कार्ययोजना है। यूनिसेफ इंडिया की फील्ड प्रमुख फरू फूजियत ने राज्यों के प्रयासों की सराहना की।