बारिश करवाने के लिए इंसान ने कितने जतन किए, देवताओं को पटाने के लिए हवन यज्ञ किए मगर जब बारिश आ गई तो मानो आफत का मौसम आ गया। एक घंटा हुई बारिश से बाज़ार मुहल्ले झील हो गए। न रुकने वाली बौछारों में जनाब आफिस के लिए रवाना हुए। पानी से बचने पहुंचने संभलने में थोड़ा वक्त लग गया। जिस चीज़ की आदत न रहे फिर यकायक मिल जाए तो ऐसा होता ही है। हमने आत्मीयता दिखाकर पूछा, परेशान दिख रहे हैं। जनाब बोले यह बारिश हमेशा गलत समय पर आती है, आठ साढ़े आठ बजे घर से निकलना होता है ऐन वक्त पर ऊपर वाला पानी पानी कर दिया। हमने बिना लाग लपेट के पूछा, कब होनी चाहिए बारिश। जवाब स्पष्ट था, दिन में दस बजे के बाद हो जाए रात को दस बजे के बाद हो तो और अच्छा। जनाब ने ठीक कहा- बारिश अब हमारी मर्जी से होनी चाहिए। देखिए न, कई सालों से हम अस्तव्यस्त जीवन से कुछ घंटे निकाल कर पड़ोसी शहर में मित्र परिवार से मिलने का सामाजिक कार्यक्रम बना रहे थे मगर गलत वक़्त पर हुई कुछ देर की बारिश से शहर वेनिस हो गया और नाव हमारे पास थी नहीं। हमारे मित्र को पानी से बचने के लिए घर की छत पर चढ़ना पड़ा। उनका स्कूटर गली की नदी में बहने से बचा और कार भी गंदे पानी में डूबी रही।

बारिश का गलत समय पर आना तो गलत है ही, कहीं भी बरस लेना और ज्यादा गलत है। जहां चाहिए वहां न बरसना, किसानों को भरमाते तरसाते रहना फिर तैयार या खेत में पड़ी कटी फसल पर पानी फेरना तो ऊपर वाले की मनमानी ही है। नेताजी बारिश के बारे कुछ न बोलें हो नहीं हो सकता। उन्होंने सोच समझकर कहा, दिल से कहूं तो बारिश बहुत रोमांटिक चीज़ है। दिमाग़ से बोलूं तो बारिश अब परेशान ही करती है। नालियां, सड़कें, खड्डे पानी से भर जाते हैं और हमारी नई गाड़ी गंदी हो जाती है। परेशान जनता हमें परेशान करती है। हम भी इंसान हैं हमें बीपी और पत्नी को लो बीपी हो जाता है। गलत बात है न ऊपर वाले की, उसे ऐसा नहीं करना चाहिए, एक बात और नोट कीजिए, हमेशा व्यवस्था को कोसते रहना अब असंवैधानिक है।

सावधान रहें। हमारे एक मित्र पर्यावरण के दीवाने हैं। बारिश से खुश, स्वतः बोले, इतना कुछ सहने के बाद मां प्रकृति अभी भी कितनी दयालु है। अब, हम सब, हर समय सब कुछ अपनी अपनी पसंद का चाहते हैं। हमने एकजुट होकर जल, थल, नभ, अग्नि और वायु यानी जीवन तत्वों को जी भर लूटा खसूटा। पर्यावरण को बचाने वाले कानून खूब बनाए और उन्हें लाइब्रेरी की किताब बना दिया। पोस्टरबाजी, दिखावा, फैशन व नारेबाज़ी के हवाले कर दी हर मुहिम। अनगिनत आयोजन, कितने प्रस्ताव पास किए मगर सब फेल। पर्यावरण बचाना तो अब एक मनोरंजक धुन है जिस पर सब पर्यावरण प्रेमी बन ठुमका लगा रहे हैं। क्षेत्र के विकास प्रणेता से बात हुई बोले, बारिश नहीं, सोच ही समस्या है। उन्होंने समझाया कि एक दिन संसार का विनाश निश्चित है तो व्यर्थ चिंता क्यूं।

विकास तो एक सतत प्रक्रिया है, जारी रहेगी तभी तो देश आगे बढ़कर विश्व शक्ति व विश्व गुरु बनेगा। विकास से ही राजनीतिक, धार्मिक, जातीय, क्षेत्रीय व निजी समृद्धता आएगी। कुछ व्यवस्था विरोधी कह रहे हैं कि इंसान की गलती के कारण बारिश कम होती है। यार बारिश न भी हो क्या फर्क पड़ता है। चीन नकली बर्फ गिरा सकता है तो नकली बारिश करवाना असंभव नहीं। संसार में तीन चौथाई पानी है जिसे विकास रथ में कहीं भी पहुंचाया जा सकता है। यह काम वृक्ष लगाने से ज्यादा आसान है। कौन पौधे लाए, कौन लगाने को खाली जगह खोजे, कौन लगाए, हाथ गंदे करे और उस दिन का इंतजार करे कि पौधे पेड़ बनेंगे और बारिश करवाने में सक्रिय भूमिका निभाएंगे। अभी तो पौधों के लिए पानी मुहय्या कराना भी पंगा है। थैंक गॉड हमारे पीने के लिए मिनरल वाटर है।

सब ठीक फ़रमा रहे हैं। हमारी स्वार्थी असहनशील जीवन शैली को अब कुछ भी तो ऐसा नहीं चाहिए जो परेशानी पैदा करे तभी तो दिमाग़ से चाहते हैं कि जीवन अमृत देने वाली बारिश अब हमारी मर्ज़ी से हो। मेरी संस्कृति प्रेमी पत्नी का सुझाव है कि कुदरत की बची खुची नेमतों का सही उपयोग करने की सही प्रेरणा लेने देने के लिए गायन व डांस का मासिक राष्ट्रीय आयोजन प्रशासन को हर शहर में करवाना चाहिए जो वाटर बाटलिंग प्लांट द्वारा प्रायोजित हो। किसी मंत्री या अनुभवी नेता के संबंधी को यह नैतिक जिम्मेवारी पकड़ लेनी चाहिए जो गंगा के पानी की तरह इस संभावित प्राजेक्ट को सुफल बनाने में दिन-रात को पानी-पानी कर डाले। इस सन्दर्भ में ‘इंडियन वाटर आइडल’ का आयोजन भी सक्रिय भूमिका निभा सकता है जिसके पुरस्कार इंद्रदेव के मेकअप में कुटिल राजनेता के हाथों दिए जाने चाहिए।

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